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।। मृगुणि स्तुती ।। [Mruguni Stutee / Harinee Stutee]




[Mruguni Stutee / Harinee Stutee]
[Mruguni Stutee / Harinee Stutee]

।। मृगुणि स्तुती ।।


अग्रे ब्याध कर धृत शरः पृष्ठतो जाल माला ।

पार्श्वे बन्हि दहति बिपिनं संनिधौ श्वान मेला।।


एणि गर्भा अलप गमना बालकाः क्रोड लीला।

श्चिन्त युक्ता बिलपति मृगी किं करोमि क्वा यामि।।


एणि चिन्तत्य भगतभयचेतसा श्रीनिबासं।

श्रुत्वा पूर्ब जलचर ग्राह त्रायमाणम गजेन्द्र।।


स्तोत्रम् कर्तुं जप विधिहुति भाबनां नास्ति शक्ति।

पादंबोजे शरणं पतितां रक्ष बा नैब रक्ष।।


आदिष्टेन मरम भृता गर्जोतो मेघमाला।

घोरे नीरे बहति मरुते खण्डितो जालमाला।।


सर्प घात र्नर हन्ति च भुक श्वानयो बज्र पीडा।

मन्दं मन्दं चलन्ति हरिणी साधु साधु बिधाता।।




[Mruguni Stutee / Harinee Stutee]

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